एक और कबीर - मुनिश्री तरुणसागर
भारत का इतिहास संत और मुनियों की गौरवमय गाथाओं से भराहुआ है। इस देश की धरती पर अनेक तीर्थंकर, अवतार एवं संत-पुरुष अवतरित हुए, जिन्होंने अपने चिन्तन और चर्या से समाज व राष्ट्र को जीने की सही दिशा और प्रेरणा दी। महापुरुषों की इस अविछिन्न परम्परा में जैन मुनिश्री तरुणसागरजी एक ऐसे ही क्रान्तिकारी संत हैं, जो देश में हिंसा, भ्रष्टाचार, अंधपरम्परा, अशांति और साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं तथा अहिंसक समाज की संरचना में संलग्न हैं।
26 जून, 1967 को दामोह जिले के गुंहची गांव में जन्मे मुनिश्री तरुणसागरजी का पूर्व नाम पवन कुमार जैन था। पिता श्री प्रतापचन्द जैन के घर-आंगन में माता श्रीमती शांतिबाई की कोख से जन्मा यह बालक बाल्यावस्था से ही विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न था। मुनिश्री की प्राइमरी शिक्षा अपने गांव में हुई। इसके बाद जब वे माध्यमिक शिक्षा के लिए गांव से 2 कि.मी. दूर झलौन ग्राम में पढ़ रहे थे, तब एक दिन वहां जैनाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज का आगमन हुआ। मुनिश्री विद्यालय से अपने घर लौट रहे थे कि मार्ग में एक होटल में बैठकर जलेबी खाते हुए उन्होंने आचार्यश्री का प्रवचन सुना। प्रवचनों से वे बड़े प्रभावित हुए और 13 वर्ष की उस किशोरावस्था में ही उन्होंने गृह त्याग कर दिया। 18 जनवरी, 1982 को अकलतरा (छत्तीसगढ़) में देशव्यापी विरोध के बावजूद आचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी के कर-कमलों द्वारा क्षुल्लक दीक्षा लेकर एक नया इतिहास रच डाला।
यहां उल्लेखनीय है कि दिगम्बर जैन परम्परा में आचार्य कुन्दकुन्द एवं आचार्य जिनसेन के पश्चात् 2000 वर्षों के जैन इतिहास में यह पहली घटना है जब किसी ने इतनी कम उम्र में जैन दीक्षा अंगीकार की। इस नन्हें बालयोगी का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए एक आश्चर्यजनक व रहस्यमय घटना थी। मुनिश्री ने उस सुकुमार वय में जैन श्रमण जीवन की कठोर साधनाएं साध कर यह सिद्ध कर दिखाया कि धर्म पचपन में ही नहीं, बचपन में भी संभव है। दीक्षा के पश्चात् उन्होंने जैन शास्त्रों का गहन अध्ययन-मनन किया एवं साधना को निरन्तरता प्रदान करते हुए 20 जुलाई, 1988 को बागीदौरा (राज.) में दिगम्बरत्व का बाना लेकर समाज की नग्नता को ढकने के लिए अपने तन के वस्त्र तक छोड़ दिए।
मुनि जीवन में उनकी प्रतिभा कोहिनूर की भांति चमकती गई। तत्व चिन्तन से उनकी वाणी के ओज ने जैन धर्मावलम्बियों के साथ अन्य समुदाय के लोगों को भी आकर्षित किया। जहां भी उनका विहार हुआ, उनके प्रवचन सुनने के लिए अथाह भीड़ उमड़ पड़ी। दिल्ली, भोपाल, अहमदाबाद, जयपुर, इन्दौर, मेरठ, नासिक, पुना, सूरत, रायपुर, देहरादून, मैसूर, बैंगलोर आदि नगरों-शहरों में उमड़ा जन-सैलाब इसका सबूत है। मुनिश्री के प्रवचन शास्त्र-सम्मत तो होते ही हैं, इतने सरल, व्यावहारिक, रोचक एवं बोधगम्य होते हैं जो सीधे हृदय को स्पर्श कर जाते हैं। मुनिश्री तरुणसागरजी के प्रवचन सर्वग्राही हैं। यही कारण है कि उनकी धर्म सभाओं में न केवल जैन बल्कि वैष्णव, सिख, सिंधी और मुसलमान तक शिरकत करते देखे जा सकते हैं।
लोगों का अनुभव है कि वे जब बोलते हैं तो केवल मुंह से नहीं बोलते, उनका रोम-रोम बोलता है, कण-कण बोलता है। उनकी भाव-भंगिमा इतनी सजीव होती है कि प्रवचनों में प्राण आ जाते हैं। जो भी उनके मुखारविन्द से फुटी ज्ञान गंगा के झरने में एक बार स्नान कर लेता है, वह बार-बार इसकी अभिलाषा रखता है। जिस तल्लीनता से मुनिश्री के प्रवचन सुने जाते हैं, वह तल्लीनता अन्य मुनियों की सभा में दुर्लभ है।
सदियों से इस राष्ट्र को एक कबीर की प्रतीक्षा थी। कबीर से लेकर आज तक इस देश में अनेक संत हुए, लेकिन कबीर कोई नहीं हुआ। कबीर होने के लिए एक विशेष आग की जरूरत होती है, वह आग जो समाज की विषमताओं और विसंगतियों को जलाकर राख कर दे। अब वर्षों बाद राष्ट्र को अप्रतिम क्रान्तिकारी संत मुनिश्री तरुणसागरजी की शक्ल में वह आग मिली है। जब तेरह वर्ष की अल्पायु में उन्होंने दीक्षा ली थी, तब कौन यह कल्पना कर पाया था कि यह बालक आगे चलकर अपने क्रान्तिकारी विचारों से समूचे राष्ट्र को झकझोर कर रखा देगा। ‘जैन संत’ से ‘जन-संत’ बनने में इस क्रान्तिधर्मी अग्नि-पुरुष ने एक लम्बा सफर तय किया है। आज यह अग्नि शलाका पुरुष अपनी प्रसिद्धि की पराकाष्ठा पर है और जन-जन के मन-मस्तिष्क पर बैठा व छाया हुआ है।
मुनिश्री का चिन्तन अत्यंत व्यापक और उदार है। वे केवल जैन धर्म या जैन समाज के हित में नहीं सोचते हैं बल्कि उनके चिन्तन में राष्ट्रीयता और विश्व कल्याण की मंगल भावनाएं निहित हैं। यही कारण है कि वे जैन संत नहीं, अपितु ‘जन-संत’ के रूप में पहचाने जाते हैं। उनके क्रान्तिकारी विचारों ने उन्हें जैन समाज में ही नहीं अपितु पूरे देश में ‘क्रान्तिकारी संत’ के रूप में स्थापित कर दिया है। मांस निर्यात के खिलाफ उन्होंने एक राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया है तथा इस सम्बन्ध में नई सदी के पहले दिन 1 जनवरी, 2000 को दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्र को अहिंसा और शांति का संदेश दिया।
धर्म के सम्बन्ध में मुनिश्री का चिन्तन है कि धर्म ओढ़ने-बिछाने की नहीं, अपितु जीने की चीज है। आज धर्म को जिया नहीं जा रहा, यही कारण है कि भारत धर्मप्राण देश होने के बावजूद भी अनेक बुराइयों की गिरफ्त में है तथा निरन्तर समस्याओं से जूझ रहा है। वे कहते हैं कि जब तक इस मुल्क में आदर्शों को व्यावहारिक और सार्वजनिक जीवन में स्थान नहीं मिलेगा, तब तक जीवन, व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र समस्याओं से मुक्त नहीं हो सकता। इसीलिए वे महावीर स्वामी को चौराहे पर खड़ा करने की बात करते हैं। जनवरी, 1996 को जब इस मुनि ने इन्दौर के राजवाड़ा पर अपनी एक ऐतिहासिक सभा में यह घोषणा की कि ‘मैं महावीर को चौराहे पर खड़ा देखना चाहता हूँ ताकि उनका संदेश और आदर्श जीवन दुनिया के सामने आ सके’, तब पूरा जैन समाज सकते में आ गया था। यह जैन समाज की एक लम्बी परम्परा पर पहली चोट थी। आज भी क्रान्तिकारी संत का यह वाक्य जैनियों को चुभता है। पहले तो सिर्फ जैन समुदाय ही इनके विचारों से तिलमिलाता था, अब देश के अन्य धर्मावलम्बी भी इन्हें सुन-सुनकर स्तंभित और अवाक हैं। मुनिश्री का चिन्तन और कार्यशैली एकदम नायाब और समसामयिक है, जो कि परम्परावादियों को पहली बार में कम ही रास आती है। मानव सेवा और जनकल्याण के प्रति समर्पित मुनिश्री ने देश के कई प्रान्तों में करीब 30 हजार कि.मी. की पैदल यात्रा करके मार्ग में सभागत लाखों लोगों को धर्म का उपदेश देकर उन्हें मांसाहार, नशा तथा अन्य बुराइयों से मुक्ति दिलाई तथा जीने की कला के रू-ब-रू कराया है। आधुनिकता और भौतिकता के दुष्चक्र से मुक्त होकर इस लोक में सुख और समृद्धि के साथ सार्थक जीवन जीने और जीवन-मुक्ति की दिशा में अग्रसर होने के लिए मुनिश्री तरुणसागरजी का हमें अनुगामी होना चाहिए,यहीसमयकीपुकारहै।