आध्यात्मिक आकाश में जगमगाता नक्षत्र


सन् 2003 का साल था और जनवरी का महीना। अच्छी तरह याद कड़कड़ाती सर्दी के जब इंदौर के दशहरा मैदान पर आग बरसने का अहसास हज़ारों लोगों ने किया। यहॉं मुनिश्री तरुणसागरजी आए हुए थे और हर दिन सुबह की सर्द हवाओं को चीरती उनकी वाणी को सुनने शहरभर के लोग दौड़ आते थे। अकेले इंदौर ही नहीं पूरे मध्यप्रदेश और आसपास के अन्य प्रांतों के भी सैकड़ों श्रद्धालु यहॉं डेरा डाले हुए थे।

मैं उन दिनों ‘नई दुनिया’ में हुआ करता था, जो मध्यप्रदेश का प्रतिष्ठित हिन्दी अ़खबार है। इस अ़खबार में मैं नौ साल रहा और इस दौरान देश के कई संतों, धार्मिक नेताओं और शंकराचार्यों से मेल-मुलाक़ातें कीं। कुछ अपनी निजी दिलचस्पी से तो कुछ अ़खबार कवरेज के मक़सद से। लेकिन 2003 के साल के जनवरी महीने की कुछ स्मृतियॉं दिमाग में आजतक अंकित है, जब पहले तो तरुणसागरजी को दूर से सुना और फिर जब रहा न गया तो एक दिन उस जगह गया, जहॉं वे ठहरे थे। मुझसे एक बार किसी दफ्तर के क्लर्क ने एक फॉर्म भरवाते समय पूछा था - ‘श्रीमान आपका स्थायी पता क्या है?’ मैं कोई संत या दार्शनिक नहीं हूँ। पता नहीं उस सवाल पर कैसे मुँह से निकल गया - ‘आदरणीय ! इस संसार में कोई है जिसका कोई स्थायी पता हो?’ ऐसे जवाब की उस क्लर्क को भी मुझसे उम्मीद नहीं होगी, लेकिन पहले तो वो चौंका और फिर मेरी बात का मतलब उसे समझ में आया और मुस्कुराकर बोला- ‘आप सही कहते हैं…. किसी का कोई पता स्थायी नहीं है।’
उन दिनों इंदौर के केशरबाग रोड की ही किसी कॉलोनी के एक आलीशान मकान में तरुणसागरजी का अस्थायी पता था, जहॉं मैं उनसे मिला। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अपने पत्रकारीय जीवन में अलग-अलग जिन क्षेत्रों की नामचीन विभूतियों से मैंने मुलाक़ातें कीं, उनमें से कुछ गिने-चुने ही ऐसे हैं, जिन्होंने वैचारिक धरातल पर मेरे भीतर हलचल पैदा की हो और कोई अमिट छाप छोड़ी हो। मैं गर्व से कहता हूँ कि मुनिश्री तरुणसागरजी उनमें अग्रणी हैं। कुछ बातें और कुछ अनुभव होते हैं, जो शब्दों की सीमा के परे होते हैं। तरुणसागरजी के सान्निध्य का अनुभव कुछ ऐसा ही है।
वे भारत की दस हजार साल पुरानी उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परम्परा के समकालीन प्रतिनिधि हैं, जिसने इस देश को ज्ञान के क्षेत्र में विश्व-गुरु का रुतबा दिलाया है। आप उनके विचार-वृत्त में आकर तीर्थंकरों का तेज़, बुद्ध के वैराग्य का वैभव, आदि शंकराचार्य की साधना और विवेकानन्द के तर्कों की ताज़गी का अहसास कर सकते हैै। यह वजह है कि बहुत कम उम्र में वे न केवल राष्ट्रव्यापी प्रसिद्धि हासिल कर सके, बल्कि अपने चाहने वालों में स्थायी छाप भी उन्होंने छोड़ी। दिगम्बर जैन मुनियों की कठिनतम जीवनचर्या और महावीर की दुर्गम मर्यादाओं के बीच रहकर उन्होंने जो ऊर्जा पैदा की है, वो किसी शोध के विषय से कम नहीं है। वरन्, हो सकता है कि मुनिश्री तरुणसागरजी जिस आध्यात्मिक मार्ग पर निकले, वे स्वयं तो जीवन की नश्वरता और समाधि के गहरे अनुभव प्राप्त कर मोक्ष पा जाते और किसी को कानोंकान पता भी न चलता। लेकिन अगर ऐसा नहीं हो सका और पूरी दुनिया को ये ़खबर हो गई कि बुंदेलखंड की मिट्टी से कोई श़ख्स निकला है, जिसने अपने जीवन में वर्द्धमान की प्रतिज्ञा को शिरोधार्य किया है, जो संसार के समस्त ऐश्वर्य के असर के परे नंगे पॉंव पैदल घूमता है, जो वर्षाकाल में पूरे चार महीने तक एक ही जगह ठौर बनाता है और कहीं भी रहे, दुनियाभर के विचारशील को आंदोलित करता रहता है। जैसे चेता रहा हो - ‘कब तक सोते रहोगे? हम जागे हैं, तुम भी जागो। जागरण का अनुभव लो।’
अहम बात यह है कि वे अपने प्रवचनों में किसी को नहीं बख्शते। कभी-कभी लगता है कि वे एक ऐसा आईना लिए घूम रहे हैं जो सामने वाले को उसकी असलियत दिखाता है। वे नेताओं पर बुरी तरह बरसते हैं और राजनीति की बदहाली के लिए उन्हें लताड़ने की हिम्मत रखते हैं। उनकी सभाओं में आए नेता बगलें झॉंकते हैं और सुधरने की सीख लेकर जब लौटते हैं तो कहते हैं - ‘कुछ भी हो बाबा बात पते की कहता है।’ अ़खबार वालों को धार्मिक प्रवचन करते समय सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि घंटे-डेढ़ घंटे के प्रवचन में हैडिंग क्या बनाएँ, लीड क्या लिखें और पूरी खबर क्या लिखें? क्योंकि आमतौर पर धर्मसभाओं में पहले भी हज़ार बार दोहराए जा चुके बासी दृष्टांत, पौराणिक कथाएँ और किताबी बातें ज्यादा होती हैं लेकिन मुनिश्री मीडिया वालों के लिए ़खबरों की खान हैं इसलिए हर बात हैडिंग में लेने लायक होती है। इसी मौलिकता ने उन्हें जैन समाज के बाहर भी अपार जनप्रियता प्रदान की है, उनकी सभाओं में जितने जैन होते हैं, उससे कहीं ज्यादा अजैन होते हैं। यह बात उनकी व्यापक पहुँच का सबूत है।
मैंने मुनिश्री से पूछा था कि ये हज़ारों की भीड़ सुनने आती है लेकिन बदलता क्या है? हर बार लोग सुनते हैं और अपनी दुनिया में लौटकर वही सब करने लग जाते हैं, जिससे परेशान होकर सुनने-समझने, रोशनी और रास्ते की तलाश में आते हैं। क्या वाक़ई लोग बदलते हैं? मुनिश्री का कहना था कि कथा-प्रवचन परिवर्तन के माध्यम हैं। सुनने वालों के भी अपने दायित्व हैं। केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है। लेकिन हज़ार के हज़ार कभी बदलना संभव नहीं हुआ। हज़ार सुनेंगे, सौ गुनेंगे, दस चुनेंगे और एक ही बदलेगा। शाश्वत सत्य तक पहुँचने वालों का यह आँकड़ा शुरू से अब तक इतना ही रहा है।
इस तरह सच को स्वीकार करना हर किसी के बूते की बात नहीं है। वरन् हज़ारों भावुक श्रोताओं को सामने पाकर कोई भी अहंकार से भर सकता है। लेकिन ये विश्लेषण कि सुनेंगे हज़ारों, बदलेगा एक ही, इस बात का भी परिचायक है कि तरुणसागरजी की तलाश उसी आदमी की है, और वो ये अच्छी तरह जानते हैं कि भीड़ कभी एक साथ बदलाव की चुनौती स्वीकार नहीं कर सकती। चिंगारी कोई एक ही होगी। वही लपट पैदा करेगी। मुनिश्री एक कुशल मनोवैज्ञानिक की तरह सत्य की तलाश में आए उस अकेले आदमी और उसके आसपास नज़र आती हज़ारों की भीड़ के मनोविज्ञान को ़खूब समझते हैं। इसलिए न तो ख़ुद किसी भ्रम में रहते और न ही सामने वालों को मुगालते में छोड़कर जाते। सबको धूल समान रूप से झाड़ते हैं और मुझे लगता है कि ये काम कोई अदृश्य शक्ति ही कराती है।
जनता के साथ संवाद के लिए उन्होंने जनभाषा को ही अपनाया हैऔर यही वजह है कि एक साथ हज़ारों लोग उनके विचारों को सुन-समझ पाते हैं। उन्होंने व्यर्थ विद्वत्ता प्रकट करने और शास्त्रों के गहन गूढ़ किस्से-कथाओं को बॉंचने की बजाय रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के अनुभवों, विरोधाभासों और आम आदमी की मुश्किलों के बीच से अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता निकाला है।
इसलिए जब वे बोलते हैं तो हर आदमी को यह लगता है जैसे उसी की बात कर रहे हों, उसी से बात कर रहे हों, उनकी अभिव्यक्ति को एक अलग आभा प्रदान करता है। मुझे लगता है विदूषकों की तरह मंचों पर फूहड़ कविताएँ पढ़ने वाले आज के नामी-गिरामी कवियों के लिए सत्य की ़खातिर न सही, शब्द की ़खातिर ही तरुणसागरजी की सभाओं में आना चाहिए। शायद इससे उनकी कविता का शुद्धिकरण संभव हो।
मुनिश्री की उम्र चालीस पार नहीं है। हालॉंकि उनकी आयु को इस तरह आँकना ठीक नहीं है, क्योंकि वे शरीर मात्र नहीं हैं, वे एक विचार हैं, एक ऊर्जा-पुंज हैं। शरीर की नश्वर सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन विचार शाश्वत और कालजयी होते हैं। हम कामना करते हैं कि ये कृशकाय शरीर भी स्वस्थ और दीर्घायु हो और उनके विचारों का प्रकाश भी भारत के आध्यात्मिक आकाश में एक जगमगाते नक्षत्र की तरह अपना स्थान बनाए, युगों के लिए।