राष्ट्र के नाम संदेश
मुनिश्री ने अपनी गो-हत्या और पशु-मांस निर्यात के खिलाफ एक अहिंसात्मक राष्ट्रीय आन्दोलन छेड़ाऔर पूरे देश में अहिंसा की अलख जगा दी। 30 नवम्बर, 1997 को लालकिले से इसका शंखनाद किया और 1 जनवरी, 2000 को इसकी पूर्णाहुति के रूप में लालकिले पर ही एक ऐतिहासिक ‘अहिंसा महाकुंभ’ संपन्न किया जिसमें मुनिश्री के नेतृत्व में देशभर से लाखों अहिंसा प्रेमी और सभी धर्मों के सैंकड़ों साधु-संतों ने हिंसा के खिलाफ अहिंसात्मक जंग का ऐलान किया। यह पहला मौका था जब किसी संत-मुनि ने लाल किले से राष्ट्र को संबोधित किया।
भारत संसार की आत्मा है तो दिल्ली भारत का दिल है। आज मुझे भारत और दिल्ली के सम्बन्ध में कुछ चर्चा करनी है। चर्चा तीखी होगी और सीधी होगी, आक्रामक होगी और असरदार होगी। दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले से मैं देश की अवाम और सत्ता के शीर्षस्थ लोगों से मुखातिब हो रहा हूँ।
भारत में दो संस्कृतियॉं पनपी हैं— एक कृषि-संस्कृति और दूसरी ऋषि-संस्कृति। ऋषि और कृषि की संस्कृति भारतीय संस्कृति है, अत: यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि भारत ऋषि प्रधान देश है, कि भारत कृषि प्रधान देश है। यह राम और कृष्ण का देश है, बुद्ध और महावीर का देश है, गॉंधी और विनोबा का देश है। इस देश से मांस-निर्यात कतई नहीं होना चाहिए। अपना पेट भरने के लिए किसी बेकसूर प्राणी का पेट काटना सबसे बड़ा पाप है। भारत सरकार ने दुनिया भर के कसाइयों को विदेशी पूँजी के लिए कसाई-खाने लगाने की खुली छूट देकर एक अक्षम्य अपराध किया है। महावीर और गॉंधी का देश आज हत्यारों का देश बन गया है। हमें सरकार की गलत नीतियों का खुलकर विरोध करना चाहिए, क्योंकि हिंसा का विरोध न करना उसका समर्थन है।
यह दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला है। मेरे पीछे लाल किला है, तो सामने ऐतिहासिक लाल मंदिर है। मेरे दाएँ तरफ लालकृष्ण आडवाणी हैं, तो बाएँ तरफ लाल बिहारी तिवारी (सांसद)। और इन लालों के बीच में, मैं आचार्य पुष्पदंत का लाल मुनि तरुणसागर, इस लाल किले से देश के तमाम धर्माचार्यों, संत-मुनियों का आह्वान करता हूँ कि वे अहिंसा और भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए तख्त और वक्त पर एक हो जायें। पर ध्यान रहे, हमें केवल तख्त पर ही एक नहीं होना है, अपितु वक्त पर भी एक होना है। अक्सर हम तख्त पर तो एक हो जाते हैं, पर जब वक्त आता है तो धीरे से खिसक लेते हैं। मैं पूछता हूँ क्या यह उचित है ? मेरा विश्वास है कि यदि देश के समस्त धर्माचार्य और संत-मुनि सच्चे मन से तख्त और वक्त पर एक हो जाएँ, तो भारत जैसे धर्मप्राण देश से बूचड़खानों जैसे नरकों तथा मांस निर्यात जैसी क्रूर नीतियों का रातों-रात खात्मा हो जाएगा।
मथझे प्रसन्नता है कि इस कड़कड़ाती ठंड में, तमाम बाधाओं को पार करते हुए देश के दूर-दराज क्षेत्रों से हजारों की संख्या में मांस-निर्यात विरोधी इस अहिंसा रैली में आप सब सम्मिलित हुए हैं। आज हिंसा के विरोध में आपने जो मतदान किया है वह व्यर्थ नहीं जाएगा। आपने अहिंसा के समर्थन में जो त्याग और आहुति दी है वह देर-सबेर रंग जरूर लाएगी। आज के इस आयोजन के परिणाम आने वाले समय में आपके पक्ष में होंगे। यह प्रजातंत्र है और प्रजातंत्र में वही होता है, जो प्रजा चाहती है। प्रजातंत्र में लोगों की आवाज अवश्य सुनी जाती है। हमारी सुनवाई अवश्य होगी।
आज भ्रष्ट नेताओं ने देश को बर्बाद कर दिया है। भ्रष्टाचार इनके खून में समा गया है। तभी तो आज पूरे देश को भ्रष्टाचार का बुखार चढ़ा हुआ है। ऊपर से नीचे तक और आगे से पीछे तक सब तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है। रिश्वतखोरी और कालाबाजारी इनके जीवन का धर्म बन गया है। ऐसे भ्रष्ट और स्वार्थी लोगों ने देश की स्थिति को जर्जर कर दिया है। मेरा तो विचार है कि सारी राजधानियों के भ्रष्ट नेताओं को पकड़कर कुछ समय के लिए पागलखाने में डाल देना चाहिए। यदि इन नेताओं को पकड़ लें और पागलखाने में डाल दें तो दुनिया आज और अभी शांत हो जाए।
मांस निर्यात का अर्थ है ः हिंसा, हत्या और हलाल की टेक्नालॉजी को विकसित करना। सरकार कहती है कि यदि हम देश से मांस का निर्यात बन्द कर दें तो देश को 700 करोड़ रुपयों का घाटा लगेगा। यह घाटा पूर्ति कहॉं से होगी? मुझे समझ नहीं आता कि मुद्रा के लिए सरकार ने मीट-एक्सपोर्ट जैसा घटिया तरीका क्यों अपनाया ? निर्यात ही करना है तो देश से हीरे और मोतियों का निर्यात करो, सोने और चॉंदी का निर्यात करो। घी और दूध का निर्यात करोलेकिन गाय का निर्यात न करो, उसके मांस का निर्यात न करो। पशु जो कि देश की सम्पदा है, उस पशु के मांस का निर्यात न करो। और हॉं अगर इस देश से और कुछ निर्यात करने को न मिले तो इस देश में जितने भी भ्रष्ट नेता हैं उनका ही निर्यात कर दो ताकि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो सके ….।