क्यों जरूरी है गुरु से ?

21 जुलाई 2005 को बेलगांव में सचमुच इतिहास रच गया। जहां पूज्यश्री ने शताधिक शिष्यों को गुरु मंत्र दीक्षा दी, वहीं समवशरण में कमलासन पर विराजमान होकर शिष्यों के भोले एवं जटिल प्रश्नों के लाजवाब उत्तर भी दिए। लोगों का कहना था कि महावीर स्वामी के समवशरण के बारे में अब तक सिर्फ पढ़ा और सुना था, देखा यहां पहली बार। संस्कार टी.वी. पर कार्यक्रम का देशभर में सीधा प्रसारण था। गुरुमंत्र दीक्षा कार्यक्रम इतना भव्य और नयनाभिराम था कि देशभर में इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और जोरदार मांग को देखते हुए संस्कार चैनल ने उसे लगातार पांच दिनों तक ढाई-ढाई घंटे तक पुनः-पुनः प्रसारण किया। यहां प्रस्तुत हैं गुरु पूर्णिमा महोत्सव में पूज्यश्री से पूछे गये सवाल और उनके जवाब।

गुरु मंत्र क्या है?
गुरु के द्वारा प्रदत्त मंत्र गुरु-मंत्र है। मंत्र की दीक्षा विधि तो बड़ी सरल है किन्तु उसका प्रकाश दिव्य है। छोटा-सा सेल्यूलर फोन दुनिया में किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से आपका संबंध जोड़ देता है। सेल्यूलर के बापों का बाप है गुरु मंत्र। गुरु मंत्र आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ देता है। गुरु मंत्र पर श्रद्धा जरूरी है। मंत्रों के उच्चारण से ज्यादा उनके भाव मायने रखते हैं। मंत्र अशुद्ध हो तो चल जाएगा लेकिन मन अशुद्ध हो तो नहीं चलेगा।

आपको किससे प्रेरणा मिलती है?
(मजाकिया लहजे में) ये प्रेरणा कौन है? (फिर गंभीर होकर) मुझे प्रकृति से प्रेरणा मिलती है। मगर अब ये मत पूछना कि ये प्रकृति कौन है (हंसी)।

मैं आप जैसा बोलने का प्रयास करता हूं लेकिन थक जाता हूं, क्या आप नहीं थकते?
मैं भी थकता हूं लेकिन अपने चेहरे पर थकान नहीं आने देता हूं।

देश में इतने धर्मगुरु हैं फिर भी समाज और देश में इतना दूषित वातावरण है, इसका क्या कारण है?
आज के धर्म गुरु पैसे और प्रशंसा के लिए दुनिया भर में यहां से वहां दौड़ते फिर रहे हैं। अपने अनुयायी और शिष्यों के लिए उनके पास समय कहां है? मेरा तो यह मानना है कि ज्यादातर धर्मगुरु आज विदेशों में घूम रहे हैंं। असली धर्म गुरुओं को तो आप उंगलियों पर गिन सकते हैं।

आपको पढ़ सकें, वह किताब हमें चाहिए,
आपके गुणों का हिसाब हमें चाहिए,
कैसे बने आप क्रांतिकारी संत गुरुवर,
बस इस प्रश्न का जवाब हमें चाहिए।
मार्गदर्शन क्या करेगा, यदि मन में द्वन्द्व है।
कुशल शिक्षक क्या करेगा यदि बुद्धि मंद है।
जवाब तो तुम्हारे सामने है, देखो जरा तुम गौर से,
हजार सूर्य भी व्यर्थ हैं, यदि आंख तुम्हारी बंद है।

पश्चाताप और प्रायश्चित्त में क्या फर्क है? क्या दोनों एक हैं?
पश्चाताप तो गलती का भान मात्र है, निदान है, उपचार नहीं। उपचार का मार्ग प्रायश्चित्त है। दोनों एक जैसे लगते हैं, मगर एक नहीं हैं। चार-चार आठ होते हैं, मगर चवालीस जैसे लगते हैं।

क्या आप चमत्कार में विश्वास रखते हैं?
जी नहीं, मैं चमत्कार में नहीं, साक्षात्कार में विश्वास रखता हूं।

हम ईश्वर से मिलना चाहते हैं, और इसके लिए निरन्तर साधना और प्रयास भी करते हैं। क्या ईश्वर भी हमसे मिलने के लिए कुछ करता है?
एक धनवान व्यक्ति रामकृष्ण परमहंस से मिला। पूछाः मैंने सुना है कि मां काली आपके पास आती हैं। रामकृष्ण बोलेः हां, यह सच है। व्यक्ति ने कहा ः अब की बार वह जब भी आयें तो उन्हें मुझसे मिलने भेज दीजिए। रामकृष्ण ने कहाः ठीक है, भेज दूंगा। अच्छा बताओ कि मैं उन्हें कहां भेजूं? उसने अपने घर का पता लिख कर दे दिया। रामकृष्ण ने कहा ः यह तो तुम्हारे घर का पता है, तुम्हारा पता क्या है? कुछ पल विचार करके उसने अपने कार्यालय का पता लिख कर दे दिया। रामकृष्ण ने कहा ः अरे भाई! मैं तुमसे घर का या कार्यालय का नहीं, तुम्हारा स्वयं का पता मांग रहा हूं। जब तक तुम मुझे वह नहीं दोगे मैं मां को तुम्हारे पास नहीं भेज सकता।
बात गहरी है। जिसे समझना हर एक के बस की बात नहीं है। ईश्वर हमसे मिलने का प्रयास निरन्तर जारी रखता है, परन्तु हम ही अपना ठौर-ठिकाना बदलते रहते हैं।

आपके कड़वे प्रवचन और कड़वी बातें कुछ लोगों के दिलों में कांटे की तरह चुभ जाती हैं। क्या यह पाप नहीं है?
पापड़ खाने से दांत टूट जाएं तो इसमें पापड़ का क्या दोष? दवा हमेशा कड़वी ही होती है, स्वस्थ होना है तो कड़वी दवा लेनी ही होगी।

गुरु से प्रश्न पूछना क्यों जरूरी है?
हमारे हर शास्त्र प्रश्न से शुरू होते हैं। अगर अतीत में शिष्यों द्वारा गुरु से प्रश्न न पूछे गये होते तो आज शास्त्र न होते। और शास्त्र न होते तो तुम न होते। इसलिए गुरु से प्रश्न पूछना जरूरी है। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि राजा श्रेणिक ने महावीर स्वामी से समवशरण में साठ हजार प्रश्न पूछे थे।

मैं ध्यान करने बैठता हूं तो रोना आता है, क्यों?
अच्छा है, शुभ शकुन है। यदि ध्यान में रो लिए तो जीवन में नहीं रोना पड़ेगा। रोने से आंखें धुल जाती हैं, दिल हल्का हो जाता है।

हमेशा दिन में ही सूरज क्यों निकलता है, रात में क्यों नहीं?
सूरज रात में भी निकलता है श्रीमानजी। मगर अंधेरे के कारण दिखाई नहीं देता। (हंसी)

बिनपूंजी के पूंजीपति बनना है, कौन-सा धंधा करूं?
ज्योतिषी बन जाइए। बिना पूंजी के पूंजीपति बनने का एक ही धंधा है ज्योतिष। न रंग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। इस ंधंधे में नुकसान होता ही नहीं है। ज्योतिषी 99 बातें तुम्हारी सफलता के लिए कहेगा। बस एक बाधा बता देगा। अब तुम जीत गये तो भी उसकी जीत है। कहेगा ः मैंने तो पहले ही 99% जीत की घोषणा कर दी थी। और तुम हार गये तो भी उसकी जीत है। कहेगा ः भाई साहब ! मैंने कहा था न, एक बाधा है, बस वही ले डूबी। उसकी चांदी हर हाल में है। चित्त भी उसकी है, पट भी उसकी है और अंटा तो उसके बाप का है ही।

आपको लोग हमेशा घेरे रहते हैं। फिर आप लिखते कब हैं? ‘कड़वे प्रवचन’ जैसी कालजयी पुस्तक कहां से आ जाती है?
मैं घेरे में जरूर रहता हूं, लेकिन अंधेरे में नहीं। मेरे पास समय ही समय है, क्योंकि मैं खुद समय (आत्मा) हूं, समयसार हूं। मैं दोपहर में पढ़ता हूं, शाम को तौलता हूं, रात में लिखता हूं और सुबह बोलता हूं।

क्या आपने कभी गधों के सवालों का जवाब दिया है?
जी नहीं, आज पहली बार दे रहा हूँ। (जोरदार हंसी) तुम क्या आये बहार आ गई, महफिल में हंसी की लहर छा गई।

प्राणी जगत में सबसे बेहतर प्राणी कौन है और सबसे बदतर प्राणी कौन है?
इंसान सबसे बेहतर प्राणी है क्योंकि  इसमें बुद्धि है, विवेक है, वह अपने को ऊंचा उठा सकता है, वह सत्कर्म करके देवता और भगवान भी बन सकता है। और बदतर प्राणी कुत्ता है क्योंकि वह अपनी ही जाति के भाई को देखकर गुर्राता है। यही कारण है कि कोई मां-बाप अपने बच्चों का नाम और किसी भी जानवर-पक्षी के नाम (गजकुमार, मैनाबाई, अश्वसेन, तोताराम, चकोर शाह) पर तो रख लेंगे लेकिन कुत्ते के नाम पर नहीं रखेंगे। क्या तुमने कभी सुना है कि किसी बाप ने अपने बेटे का नाम कुत्ताचंद्र रखा हो या बेटी का नाम कुतिया कुमारी रखा हो?

लोग आपको राष्ट्रसंत कहते हैं, राष्ट्रसंत तो देश में और भी कई हैं, कृपया बतायें आप विश्वसंत होना पसंद करोगे क्या?
धत् तेरे की! सब गुड़-गोबर कर दिया। मैं परिग्रह पहले ही छोड़ चुका हूं, उपाधियों का ज्यादा परिग्रह भी मैं अपने पास नहीं रखता हूं। राष्ट्रसंत क्या और विश्वसंत क्या, मेरा किसी में कोई रस नहीं है।

कुछ लोगों को कभी सम्मान नहीं मिलता, हमेशा अपमानित होते हैं, क्यों?
संसार में चार तरह के लोगों का अनादर होता है
1. दीर्घरोगी,
2. दरिद्र,
3. कटु वचन बोलने वाला,
4. दुराचारी।

देश में ऐसे कौन से मुनि हैं, जो क्रांतिकारी संत हो सकते हैं?
वह हर मुनि जो अपने भीतर आग पैदा कर सकता है। विकृतियों और विद्रूपताओं के खिलाफ संघर्ष करना है तो आग्नेय बनना होगा। समाज के अक्स और नक्श को बदलने के लिए महावीर-बुद्ध और कबीर जैसे शख्स की जरूरत हमेशा रहती है।

अगर आप अपनी जिन्दगी में मुनि न होते तो क्या बनना पसंद करते?
अगर मैं मुनि न होता तो किसी मुनि का शिष्य बनना पसंद करता क्योंकि शिष्य बनने से आशीष मिलता है और गुरु से भी पहले ईश मिलता है।

गुरु दीक्षा क्या है?
गुरु दीक्षा का अर्थ है ‘लाइन ऑफ कन्ट्रोल’। अपने जीवन की डोर किसी समर्थ गुरु के हाथों में सौंप देना। बाहर बहुत फिसलन है और आदमी का मन कभी भी, कहीं भी फिसल सकता है, डोल सकता है। गुरु वह है जो तुम्हें फिसलन भरी राहों में संभालकर रखता है। जीवन में गुरु दीक्षा जरूरी है। लेकिन मेरे कहने से गुरु दीक्षा मत लेना, औरों को गुरु दीक्षा लेते हुए देखकर भी गुरु दीक्षा मत लेना, किसी लोभ या भय के कारण गुरु दीक्षा मत लेना। गुरु दीक्षा लेना तो अन्तर मन से लेना, अन्तर्वाणी से लेना।

आपके हमसे दूर जाने के बाद, हम आपका प्यार कैसे पा सकते हैं?
गुरु पास रहें या दूर रहें नजरों में समाये रहते हैं।
उनकी वाणी का रसपान करो, बस कृपा इसी को कहते हैं।
गुरु पास रहें या दूर रहें नजरों में समाया करते हैं।
दिल से जो उन्हें याद करें, ख्वाबों में आया करते हैं।

अगर आप मुनि न होते तो?
अगर मैं मुनि न होता तो तुम मुनि होते क्योंकि जैन धर्म में एक नियम है कि अढ़ाई द्वीप में तीन कम नौ करोड़ मुनि हमेशा मौजूद रहते हैं। इस नियमानुसार अगर मैं मुनि न होता तो तुम मुनि जरूर होते।

मनुष्य होना भाग्य की बात है, तो संत होना क्या है?
सौभाग्य की बात।

माला फेरने बैठते हैं, मन इधर-उधर दौड़ता रहता है, क्या करें? क्या माला फेरना बंद कर दें?
प्रार्थना थोड़ी देर ही सही लेकिन पूरे प्राणों से करें। प्रार्थना और मंत्र जाप में यदि तुम्हारे प्राण न जुड़े तो प्रार्थना अधूरी है। मगर इसका यह मतलब कतई नहीं कि तुम माला फेरना ही बंद कर दो। माला के 107 मनकों पर मन भले ही न टिका हो, आखिरी मनके पर मन पल भर के लिए भी टिक गया तो समझना तुम्हारी प्रार्थना, मंत्र, जाप सार्थक हो गया। बतौर उदाहरण ः आप दुकान पर हैं, सुबह से शाम तक एक भी ग्राहक नहीं आया। शाम हो गई और जब तुम दुकान मंगल कर रहे थे, शटर गिरा रहे थे कि अचानक एक ग्राहक आया, 10 हजार रुपयों का माल लिया और चलता बना। अब बताओ, क्या दुकान पर बैठना व्यर्थ हुआ? जाप जपना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। अगर नकली सिनेमा देखकर कोई असली अपराधी बन जाता है तो असली नाम जपकर कोई कितने दिन नकली रह सकता है?

आपने गुरु मंत्र दीक्षा की एक नई परम्परा की शुरुआत की है, यों भी आप हमेशा नये-नये प्रयोग करते रहते हैं, इसकी वजह क्या है?
कुछ हट के दिया, कुछ हट के किया ही दुनिया को याद रहता है। और वैसे भी कुछ नया करने वालों की ही चलती है कहानी। उनके ही पैर पूछती है झुक-झुक जवानी। कौन पूछता है रेंग-रेंग कर चलने वालों को। यहां उनकी ही चर्चा है जिनकी चाल है तूफानी।

मेरे घर के सामने एक गधा रहता है। सुबह उठते ही उसके दर्शन होते हैं। यह शुभ है या अशुभ?
वाह्ः पुत्तर ! क्या कमाल का प्रश्न है।
गधे के लिए तो अशुभ ही है। तुम्हें देखने के बाद बेचारे को दिन भर बोझ ढोना पड़ता है और मार खानी पड़ती है। (हंसी)

दुनिया का सबसे पहला तीर्थ कौन-सा है?
मां की गोद दुनिया का सबसे पहला तीर्थ है। इस गोद में और तो और, खुद तीर्थंकर भी खेले हैं।

आपने बचपन में दीक्षा ले ली, गृहस्थ जीवन से दूर रहकर भी संसार की सारी बातों का आपको इतना ज्ञान कैसे मिला?
मैंने संसार छोड़ा है, समाज नहीं। समाज के बीच रहता हूं, जो कुछ देखता हूं, उसी पर अपना चिन्तन रखता हूं।

(क्षमा याचना के साथ) आप एकांत में अकेले बैठे हैं और कोई सुन्दर स्त्री आपके कक्ष में आती है तो आप कैसा महसूस करते हैं?
मेरा आपसे एक प्रति-प्रश्न है यदि आप अकेले कमरे में बैठे हैं और आपकी सर्वांग सुन्दर युवा बहन आपके कमरे में आ जाए तो आप कैसा महसूस करेंगे? (तालियां)

आप एक घंटे प्रवचन देते हैं, हमारा मन नहीं भरता, हमारा निवेदन है कि आप कम से कम दो घंटे बोला करें?
क्यों? क्या आपने मुझे पैसा देकर बुलाया है। (हंसी)

कहते हैं कि लोगों की श्रद्धा टूटती जा रही है, आस्था मरती जा रही है। क्या यह सही है?
मुझे तो नहीं लगता कि श्रद्धा मर रही है। डॉक्टर में तुम्हारी श्रद्धा है। डॉक्टर जो कुछ भी दवा देता है, तुम खा लेते हो। अखबार में तुम्हारी श्रद्धा है। अखबार जो कुछ भी लिख देता है, तुम मान लेते हो। पत्नी में तुम्हारी श्रद्धा है, पत्नी जो भी कहती है, सिर झुकाकर स्वीकार कर लेते हो। नाई में तुम्हारी श्रद्धा है। आंख बंद करके तुम अपना सिर उसको सौंप देते हो। टेलर में तुम्हारी श्रद्धा है। नया कपड़ा लेकर उसे दे देते हो और वह उसे तुम्हारे सामने ही काटता है पर तुम कुछ नहीं बोलते। कितनी श्रद्धा है तुम्हारी डॉक्टर में, अखबार में, पत्नी में, नाई में, टेलर में। फिर भी तुम कहते हो कि श्रद्धा मर रही है। मन तुम्हें भटकाता है, फिर भी तुम मन की मानते हो। कितनी गहरी श्रद्धा है तुम्हारी मन पर। जैसे श्रद्धा संसार में है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि श्रद्धा मर रही है, हां ! इतना जरूर है कि संसार के प्रति जैसे प्रगाढ़ श्रद्धा है वैसी धर्म और अध्यात्म के प्रति नहीं है और यही कारण है कि धर्म जीवन के रूपांतरण में सहयोगी सिद्ध नहीं हो पा रहा है।