मुक्तिपथ की ओर
एक चम्मच दही पूरे दूध को बदल देता है। यही मुनिश्री तरुण सागर जी के साथ हुआ। आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी के एक वाक्य ने उनका पूरा जीवन बदल दिया। उस समय मुनिश्री की उम्र यही कोई बारह-तेरह साल की रही होगी और वे छटवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। एक दिन जब वे विद्यालय से अपनी घर जा रहे थे तो रास्ते में एक होटल पर जलेबी खाने के लिए रुके। कुछ ही दूरी पर आचार्यश्री का प्रवचन चल रहा था। वे प्रवचन में कह रहे थे कि ‘तुम भी भगवान बन सकते हो’। आचार्य श्री का यह वाक्य जलेबी खाते बालक पवन कुमार के कानों में पड़ा तो जलेबी का स्वाद तो जाता रहा और वह अगले ही दिन भगवान बनने के लिए मुक्ति के पथ पर निकल पड़ा। यह आचार्य कुंदकुंद और जिनसेन के पश्चात् 2000 वर्ष की जैन इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी ने इतनी कम उम्र में ‘जिनेश्वरी दीक्षा’ लेकर मुक्ति के पथ पर चलने का संकल्प किया।