बीमार दिलों और बिगड़े दिमागों को ठीक करता एक दिगम्बर सन्त

कोई चाहे भी तो, युवा संतश्री तरुणसागरजी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। पता नहीं, इस संत में क्या खास बात है कि हर समाज, हर तबके के लोग उन्हें समान श्रद्धा के साथ सुनते हैं। सुनते ही नहीं, गुनते भी हैं। बैठे-ठाले, यह संत लोगों की आदतें सुधार रहा है। उनसे बुराइयां छुड़वा रहा है। इस संत का मंत्र है - अपने प्रति ईमानदार रहो। प्रतिदिन एक नए नियम का पालन करने की सीख यह संत देता है, और 30-40 हजार में से सौ-दो सौ श्रोता ही ऐसे होते हैं जो उस नियम का पालन नहीं कर पाते हों। पालन नहीं करने वाले श्रोता भी पूरी ईमानदारी से अपनी गलती हाथ उठाकर कबूल करने में नहीं सकुचाते, यह सत्संग से मिली शक्ति का प्रमुख उदाहरण है।

सही मानों में तो तरुणसागरजी मानव मनों के प्रहरी ही हैं। बातों ही बातों में वे श्रोता के दिल में उतरकर बोलते दिखते हैं। संत और श्रोता के दिलों के ऐसे तार जुड़ते बहुत कम देखे जाते हैं। 40-50 हजार धर्मालुओं की उपस्थिति के बावजूद परिसर में पत्ता भी नहीं खड़कता। यह मुनि, ऐसे तीखे शब्द बाण चलाता है, जो बुराइयों, कुरीतियों पर गहरे घाव कर देते हैं। वे लगभग हरदम श्रोताओं पर कोड़ा फटकारने की मुद्रा में रहते हैं। आवाज ऐसी तीखी कि कानों के पर्देनहीं फटे, तो यह भी उन्हीं की कृपा मान सकते हैं। कठोरता के बाद मधुरता इस कृशकाय मुनि की विशेषता है। उनकी वाणी, विवेक की वीणा से झंकृत होती है और लोगों को भीतर तक झकझोर देती है।

बात ही बात में लोगों को हंसाना और रुलाना दोनों ही उनके बस में हैं। उस एक घंटे के लिए पांडाल में तनाव के आगमन पर पाबंदी, पहरा होता है। लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं और आँखों की कोर भिगोते हुए भी अपने दिलों में उत्साह की अलख जगाए रहते हैं। टूटे दिलों, नाराज मनों को जोड़ना तरुणसागरजी को बहुत भाता है। वे मन-मस्तिष्क को ही नहीं, वातावरण को भी एक मिठास से भर देते हैं। वे उन राजनेताओं के लिए जलन का कारण हो सकते हैं, जो भीड़ के लिए तरसते हैं। यहां तो बिना किसी औपचारिक बुलावे के हजारों-हजार लोग रोज-रोज खिंचे चले आते हैं। लगभग रोज, पिछले दिन के मुकाबले श्रोता बढ़ जाते हैं। पांडाल छोटा पड़ने लगता है, तो लोग बाहर खड़े-खड़े संत-वाणी सुनकर कष्ट के बजाय धन्य महसूस करते हैं। असल में वहां बीमार दिलों व बिगड़े दिमागों को ठीक करने का अस्पताल ही चल रहा है और इस अस्पताल में कोई फीस भी नहीं लगती… !